भारत का इतिहास सदियों पुराना है और इस इतिहास में अनेकों विदेशी आक्रमणकारियों का वर्णन मिलता है। लेकिन जब हम बात करते हैं ब्रिटिश साम्राज्य की, तो यह एक ऐसा कालखंड था जिसने भारत की सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक ढांचे को जड़ से हिला दिया। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाया।

प्रारंभिक चरण: व्यापारिक हित

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1600 ईस्वी में हुई थी। कंपनी का मुख्य उद्देश्य भारत के साथ व्यापार करना था। 1608 में, कंपनी का पहला जहाज सूरत के बंदरगाह पर पहुंचा। धीरे-धीरे, कंपनी ने भारत में अपनी व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ाना शुरू किया और कई व्यापारिक चौकियों की स्थापना की, जैसे कि मद्रास (1639), बंबई (1668), और कलकत्ता (1690)। इन चौकियों का मुख्य उद्देश्य व्यापारिक गतिविधियों को संचालित करना था, लेकिन जल्द ही कंपनी ने महसूस किया कि भारत में राजनीतिक हस्तक्षेप से उनके व्यापारिक हितों की सुरक्षा हो सकती है।

बंगाल विजय: सत्ता की पहली सीढ़ी

1757 का प्लासी का युद्ध अंग्रेजों के भारत विजय की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम था। इस युद्ध में रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कंपनी ने नवाब सिराजुद्दौला को पराजित किया। इस विजय के बाद, कंपनी ने बंगाल, बिहार, और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त कर ली। इसका अर्थ था कि अब कंपनी इन क्षेत्रों से राजस्व एकत्रित कर सकती थी। बंगाल की समृद्धि और वहां की संपदा ने अंग्रेजों को और अधिक सशक्त बना दिया।

स्थायी बंदोबस्त और राजस्व संग्रहण

बंगाल की विजय के बाद कंपनी ने स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) की नीति अपनाई। इस नीति के तहत, कंपनी ने जमींदारों के माध्यम से राजस्व एकत्रित करना शुरू किया। जमींदारों को निश्चित मात्रा में राजस्व देना होता था, चाहे फसल कैसी भी हो। इस नीति ने किसानों की स्थिति को अत्यंत दयनीय बना दिया और जमींदारों की स्थिति सुदृढ़ हो गई। यह नीति कंपनी के लिए राजस्व का एक स्थायी स्रोत बन गई।

सैन्य बल का प्रयोग

अंग्रेजों ने अपने साम्राज्य विस्तार के लिए सैन्य बल का भरपूर उपयोग किया। 1764 में बक्सर का युद्ध हुआ, जिसमें कंपनी ने संयुक्त रूप से बंगाल, अवध, और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय को हराया। इस युद्ध के बाद, मुगल सम्राट ने कंपनी को दीवानी का अधिकार प्रदान किया, जिससे कंपनी ने और अधिक क्षेत्र पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया। इसके बाद कंपनी ने मराठों, मैसूर के सुल्तान टीपू सुल्तान, और सिख साम्राज्य के साथ भी युद्ध किए और विजय प्राप्त की।

कंपनी का प्रशासनिक ढांचा

कंपनी ने भारत में अपने प्रशासनिक ढांचे को भी सुदृढ़ किया। 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट और 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट कंपनी के प्रशासनिक सुधारों के प्रमुख स्तंभ थे। इन अधिनियमों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने कंपनी के कार्यों पर नियंत्रण स्थापित किया। वारेन हेस्टिंग्स, लॉर्ड कॉर्नवॉलिस, और लॉर्ड वेलज़ली जैसे गवर्नर-जनरल्स ने प्रशासनिक सुधार किए और कंपनी के शासन को व्यवस्थित किया।

सहायक संधि प्रणाली

लॉर्ड वेलज़ली ने सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance System) की शुरुआत की। इस प्रणाली के तहत, भारतीय रियासतों को अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए अंग्रेजी सेना को अपने राज्य में तैनात करना होता था और उसकी लागत भी चुकानी होती थी। इस प्रणाली के माध्यम से अंग्रेजों ने विभिन्न रियासतों पर अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके चलते, भारतीय रियासतों की स्वतंत्रता समाप्त हो गई और वे अंग्रेजों की कठपुतली बन गए।

आर्थिक शोषण

अंग्रेजों ने भारत की अर्थव्यवस्था का भी बुरी तरह शोषण किया। उन्होंने भारतीय कुटीर उद्योगों को नष्ट कर दिया और कच्चे माल का निर्यात करके इंग्लैंड में तैयार वस्त्रों का आयात किया। भारतीय वस्त्र उद्योग, जो कभी विश्व प्रसिद्ध था, अंग्रेजी वस्त्रों के सामने टिक नहीं सका। इसके अलावा, अंग्रेजों ने भारतीय किसानों को नकदी फसलों की खेती के लिए मजबूर किया, जिससे खाद्य संकट उत्पन्न हो गया।

1857 का विद्रोह: पहली स्वतंत्रता संग्राम

1857 का विद्रोह अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला महत्वपूर्ण प्रयास था। इस विद्रोह में भारतीय सिपाहियों, किसानों, और रियासतों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। लेकिन अंग्रेजों ने इस विद्रोह को क्रूरतापूर्वक कुचल दिया। इस विद्रोह के बाद, ब्रिटिश सरकार ने कंपनी का शासन समाप्त कर दिया और सीधे भारत का प्रशासन अपने हाथों में ले लिया। 1858 का भारत सरकार अधिनियम (Government of India Act) इस दिशा में पहला कदम था।

विभाजन की नीति: फूट डालो और राज करो

अंग्रेजों ने भारतीय समाज को विभाजित करने के लिए ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ने के लिए विभिन्न उपाय किए। 1909 का मार्ले-मिंटो सुधार और 1919 का मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार इसके उदाहरण हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को बढ़ावा दिया। इसके चलते, भारतीय समाज में सांप्रदायिकता की जड़ें गहरी होती गईं।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ने गति पकड़ी। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ जोरदार आंदोलन चलाए। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन और 1947 का विभाजन इसके महत्वपूर्ण पड़ाव थे। अंततः, 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली।

निष्कर्ष

अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाने के लिए विभिन्न नीतियों और उपायों का सहारा लिया। व्यापारिक हितों से शुरू होकर, सैन्य बल, प्रशासनिक सुधार, सहायक संधि प्रणाली, आर्थिक शोषण, और विभाजन की नीति जैसे कई तरीकों का उपयोग करके उन्होंने भारत पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। हालांकि, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वीर योद्धाओं और आम जनता के संघर्ष के परिणामस्वरूप, भारत ने अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की और एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में विश्व के मानचित्र पर उभरा।

By Naveen

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